Ans. अकबर (1556–1605) की राजपूत नीति के तहत स्थापित मुगल–राजपूत संबंध केवल सत्ता संघर्ष का विषय नहीं थे, बल्कि यह नीति, स्वाभिमान और कूटनीति के जटिल समन्वय का प्रतीक थे। जहाँ एक ओर अकबर ने अपनी समन्वयवादी एवं उदार राजपूत नीति के माध्यम से साम्राज्य को स्थायित्व देने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर मेवाड़ के सिसोदिया शासकों ने अपनी स्वतंत्रता, अस्मिता और परंपराओं की रक्षा को सर्वोपरि माना। परिणामस्वरूप, अकबर और मेवाड़ के बीच संबंध केवल संघर्ष तक सीमित न रहकर, साम्राज्य विस्तार बनाम स्वाभिमान की रक्षा के रूप में विकसित हुए।
- अकबर और मेवाड़ संबंध
अकबर तथा राणा उदयसिंह (1537-1572 ई.)-
अक्टूबर, 1567 में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। अपने सरदारों की सलाह पर उदयसिंह किले की रक्षा का भार जयमल और फत्ता नामक अपने दो सेनानायकों को सौंपकर गिरवा की पहाड़ियों में चला गया। किले की रक्षा के दौरान जयमल व फत्ता वीर गति को प्राप्त हुए। 1568 ई. में मेवाड़ का तीसरा साका होता है। अकबर ने जयमल-फत्ता की वीरता से मुग्ध होकर आगरा के किले के बाहर उनकी हाथी पर सवार पत्थर की मूर्तियाँ लगवाईं।
- अकबर तथा महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.)-
1572 ई. में जगमाल की जगह मेवाड़ सरदारों ने प्रताप को गद्दी पर बिठा दिया। इस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह अकबर का शासन था। प्रताप के सामने दो मार्ग थे-
• या तो वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर सुविधापूर्ण जीवन बिताये।
• या अपना स्वतंत्र अस्तित्व और अपने देश की प्रतिष्ठा बनाये रखे।
दूसरा विकल्प चुनने की स्थिति में उसे अनेक कष्ट उठाने थे, फिर भी प्रताप ने दूसरे विकल्प 'संघर्ष’ को ही चुना। इस संघर्ष की तैयारी में उसने सबसे पहले मेवाड़ को संगठित करने का बीड़ा उठाया। अपने कर्त्तव्य और विचारों से उसने सामन्तों और भीलों का एक गुट (संगठन) बनाया जो सदैव देश की रक्षा के लिए उद्यत रहे। मुगलों से बचकर युद्ध का प्रबन्ध करने के लिए उसने गोगुंदा से अपना निवास स्थान कुंभलगढ़ स्थानांतरित कर लिया।
अकबर किसी भी तरह से मेवाड़ को अपने अधीन करना चाहता था। अतः उसने समझौते के प्रयास किये। 1572 ई. से 1576 ई. के मध्य उसने चार शिष्ट मण्डल क्रमशः जलाल खाँ, मानसिंह, भगवानदास एवं टोडरमल के नेतृत्व में भेजे। मगर महाराणा ने संधि करने में किसी प्रकार की रूचि नहीं दिखाई। अतः मेवाड़ को मुगल आक्रमण का सामना करना पड़ा। 1576 ई. के प्रारंभ में अकबर मेवाड़ अभियान की तैयारी हेतु अजमेर पहुँचा और वहीं उसने मानसिंह को मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा।
18 जून 1576 ई. को खमनौर के पास मुगल सेना का प्रताप से युद्ध हुआ जो इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में मुगल सेना का मुख्य सेनापति आमेर का मानसिंह था जबकि प्रताप की सेना में कृष्णदास चुण्डावत (सलूम्बर), रामशाह तोमर (ग्वालियर), हाकिम ख़ान सूर तथा पूंजा भील आदि थे। युद्ध में प्रताप के जीवन को संकट में देखकर झाला बीदा ने प्रताप का मुकुट धारण कर युद्ध किया और प्रताप को युद्धभूमि से दूर भेज दिया। यह युद्ध अनिर्णायक रहा। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने पहाड़ों में रहते हुए वहीं से मुगलों को परेशान करने के लिए धावे मारना शुरू कर दिया।
1576 से 1585 तक अकबर ने मेवाड़ पर अधिकार करने के लिए अनेक अभियान भेजे किन्तु अधिक सफलता नहीं मिली। इस कालखण्ड में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटित हुई। महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने 1580 में अचानक शेरपुर के मुगल शिविर पर आक्रमण कर अब्दुर्रहीम खानखाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बना लिया। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम की जानकारी मिलने पर प्रताप ने मुगल महिलाओं को ससम्मान सुरक्षित भिजवाने के आदेश दिये। नारी सम्मान की भारतीय परम्परा का यह अनुपम उदाहरण है। 1582 में दिवेर की मुगल चौकी पर आक्रमण के समय कुंवर अमरसिंह ने वहां पर तैनात मुगल अधिकारी सुल्तान खां को भाले के एक ही वार से परलोक पहुंचा दिया। दिवेर की विजय के बाद इस पर्वतीय भाग पर प्रताप का अधिकार हो गया। एक छोटी सी मेवाड़ी सेना की यह बहुत बड़ी सफलता थी। यही कारण था कि कर्नल टॉड ने दिवेर को 'मेवाड़ का मेराथन' कहा है।
1585 ई. के बाद अकबर मेवाड़ की तरफ कोई अभियान नहीं भेज सका। 1585 से 1597 ई. के बीच प्रताप ने चित्तौड़ एवं माण्डलगढ़ को छोड़कर शेष राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया, चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया और राज्य में सुव्यवस्था स्थापित की।
- अकबर तथा राणा अमरसिंह (1597-1620 ई.)-
अमरसिंह 1597 ई. में मेवाड़ का शासक बना। शासक बनने के उपरांत उसे मुगल आक्रमणों का सामना करना पड़ा।
अकबर और मेवाड़ के शासकों के बीच संबंध केवल युद्ध (जैसे हल्दीघाटी का युद्ध) तक सीमित नहीं थे, बल्कि यह भारतीय इतिहास में साम्राज्यवाद बनाम स्वाभिमान की एक दीर्घकालिक और प्रेरणादायक गाथा के रूप में उभरते हैं। अंततः अमर सिंह और जहांगीर के बीच हुई संधि (5 फ़रवरी, 1615 ई.) ने इस लंबे संघर्ष का व्यावहारिक अंत किया।