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लोकसभा का गठन: 17 अप्रैल, 1952

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  • आज ही के दिन 1952 में प्रथम लोकसभा (हाउस ऑफ द पीपल) का आधिकारिक गठन हुआ, जिसने प्रथम आम चुनावों के पश्चात भारत में संसदीय लोकतंत्र की औपचारिक शुरुआत को चिह्नित किया।
  • निचले सदन के रूप में, यह भारत के नागरिकों की प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रमुख प्रतिनिधि संस्था के रूप में कार्य करती है।
  • जन-इच्छा को प्रतिबिंबित करते हुए, यह भारतीय संसदीय प्रणाली में विधि-निर्माण, कार्यपालिका की जवाबदेही तथा वित्तीय नियंत्रण में केंद्रीय भूमिका निभाती है।

सदन के मुख्य स्तंभ

  • लोकप्रिय सदन: राज्यसभा के विपरीत, लोकसभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं, जो जनता की तात्कालिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • वित्तीय सर्वोच्चता: धन विधेयकों पर लोकसभा का विशेष अधिकार होता है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से केवल इसी सदन के प्रति उत्तरदायी होती है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका जनता के प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
  • निश्चित कार्यकाल: इसका सामान्य कार्यकाल इसकी प्रथम बैठक के लिए नियत तिथि से पाँच वर्ष का होता है, जिसके पश्चात यह स्वतः भंग हो जाती है; हालाँकि, इसे राष्ट्रपति द्वारा समय से पहले भी भंग किया जा सकता है।

तथ्य

  • प्रथम बैठक: 13 मई, 1952
  • प्रथम अध्यक्ष: जी.वी. मावलंकर।
  • संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 81 के तहत शासित।
  • नामकरण: मूल रूप से इसे "हाउस ऑफ द पीपल" कहा जाता था, आधिकारिक तौर पर 14 मई, 1954 को इसका नाम 'लोकसभा' अपनाया गया।