Ans:- 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन से एक जागरूक मिडिल क्लास का उदय हुआ, जिसने भारत के अलग-अलग हिस्सों में राष्ट्रीय आंदोलनों को संगठित किया।
सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने कई ऐसी अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं, जिनके फलस्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ, जैसे—
1. भारत के अतीत की पुनर्खोज: सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने भारत की प्राचीन गरिमा पर ज़ोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीयों में आत्मविश्वास जागा। उन्होंने भारत के सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होने के ब्रिटिश दावों को भी चुनौती दी; उदाहरण के लिए, स्वामी विवेकानंद ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने उजागर किया।
2. राष्ट्रवाद का विकास: इसने भारतीयों के मन में राष्ट्रवाद की भावना भी जगाई, जिसने लोगों को किसी एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट करने में एक मनोवैज्ञानिक शक्ति के रूप में काम किया। उदाहरण के लिए, दयानंद सरस्वती ने 'स्वराज', 'स्वदेशी', 'स्वभाषा' और 'स्वधर्म' की वकालत की।
3. क्षेत्रीय साहित्य का विकास: राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती जैसे सुधारकों ने क्षेत्रीय भाषाओं में साहित्य की रचना की, जिसने लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
4. मध्यम वर्ग का उदय: सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कारण एक नए मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाया। उदाहरण के लिए, बंबई (मुंबई) में हुई गतिविधियों के परिणामस्वरूप गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं का उदय हुआ।
5. सुधार आंदोलनों के लक्ष्य :- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का उद्देश्य समाज के कमज़ोर वर्गों का उत्थान करना और सामाजिक तथा धार्मिक कुरीतियों को दूर करना था। उदाहरण के लिए, इन आंदोलनों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार किया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आंदोलनों में उनकी बड़े पैमाने पर भागीदारी सुनिश्चित हुई।
6. अल्पसंख्यकों की उद्धार : इन आंदोलनों के कारण अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार हुआ और उन्होंने भी राष्ट्रीय आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उदाहरण के लिए, अलीगढ़ आंदोलन ने मुसलमानों के बीच एक आधुनिक दृष्टिकोण विकसित किया।
7. शिक्षा का विकास: सुधारकों ने शिक्षा के विकास के लिए भी काम किया और कई स्कूलों तथा कॉलेजों की स्थापना की। इसने लोगों के बीच एक आधुनिक दृष्टिकोण और मूल्यों का विकास किया; उदाहरण के लिए, आर्य समाज ने 'डी.ए.वी.' (DAV) स्कूलों की स्थापना की।
लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में केवल सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का ही योगदान नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई, जो इस प्रकार है—
1. राजनीतिक एकीकरण: ब्रिटिश नीतियों—जैसे 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) और 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse)—के कारण भारत का राजनीतिक एकीकरण हुआ, जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने मनोवैज्ञानिक स्तर पर और अधिक सुदृढ़ किया।
2. आधुनिक बुनियादी ढाँचा: — अंग्रेजों ने रेलवे, टेलीग्राफ़ और डाक सेवाओं जैसे आधुनिक बुनियादी ढाँचे भी बनाए, जिससे नेताओं के लिए पूरे भारत में घूमना और अपने विचारों का प्रचार करना आसान हो गया।
3. अंग्रेजी शिक्षा: — अंग्रेजों ने अपने फ़ायदे के लिए अंग्रेजी शिक्षा शुरू की, लेकिन इसने लोगों में राजनीतिक चेतना जगाने और समाज में आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को लाने में भी मदद की।
4. राजनीतिक प्रशिक्षण: — प्रशासन और न्यायपालिका में भारतीयों की भागीदारी ने उन्हें राजनीतिक लामबंदी के लिए प्रशिक्षित किया, जिसका उपयोग नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलनों में किया।
5. आंदोलन के लिए वैचारिक आधार: — अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के कारण भारत में गरीबी बढ़ी और धन का निकास हुआ, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए एक वैचारिक आधार विकसित करने में योगदान दिया।
इस प्रकार सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया वहीं ब्रिटिश शासन ने इसके विकास में उत्प्रेरक की भूमिका अदा की