अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रो. सी. राजा मोहन ने दिए हैं !
- पारस्परिकता (Reciprocity): भारत रणनीतिक भागीदारों के साथ आपसी सहयोग और विश्वास पर जोर देता है, और उन देशों का समर्थन करता है जो राष्ट्रीय हितों के प्रति समान प्रतिबद्धता दिखाते हैं।
- विविधीकरण (Diversification): रणनीतिक और आर्थिक मामलों में किसी एक देश या गुट पर निर्भरता कम करके अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों का तेजी से विस्तार करना।
- रणनीतिक लचीलापन (Strategic Flexibility): विदेश नीति के निर्णयों में पूर्ण स्वतंत्रता बनाए रखना और वैश्विक ध्रुवीकरण (जैसे क्वाड और ब्रिक्स दोनों में सक्रियता) के बावजूद अपने हितों को सर्वोपरि रखना।
- रणनीतिक विस्तार (Strategic Expansion): वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र में उभरते हुए क्षेत्रों—विशेष रूप से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र—की ओर कूटनीतिक पहुंच का दायरा बढ़ाना।
- घरेलू नवीनीकरण (Domestic Renewal): कूटनीति की सफलता अंततः आंतरिक आर्थिक और सैन्य शक्ति पर निर्भर करती है। इसलिए, देश के आंतरिक विकास और क्षमताओं को मजबूत करना कूटनीति का प्रमुख आधार है।